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फैक्ट चेक: क्या मुद्रा लोन से वाकई देश में पैदा हो रहे हैं रोजगार?

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्लैगशिप ‘मुद्रा योजना’ का जोर-शोर से प्रचार सुनने में उत्साह जगाने वाला लगता है, लेकिन हकीकत में वो नतीजे सामने नहीं आ पा रहे जैसी उम्मीद थी. ये वो प्रोजेक्ट है जिसका हवाला प्रधानमंत्री देश में रोजगार सृजन के सबूत के तौर पर देते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने बीते महीने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था, ‘हमने मुद्रा योजना के तहत 13 करोड़ युवाओं को कर्ज बांटे.’ प्रधानमंत्री ने ये बात कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस आरोप के जवाब में कही थी कि मोदी सरकार हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने के वादे में नाकाम रही.

मुद्रा यानी ‘माइक्रो यूनिट्स डेवेलपमेंट एंड रीफाइनेंस एजेंसी’ को मोदी सरकार ने 2005 में लॉन्च किया था. उद्देश्य आर्थिक किल्लत वाले छोटे कारोबारियों को कर्ज दिलाना था.

याचिका में 9 सवाल

हम ने मुद्रा को लेकर किए गए दावों की पड़ताल करने का फैसला किया. इसके तहत सूचना के अधिकार (RTI) की याचिका के तहत वित्त सेवा विभाग से पूछा गया कि मुद्रा से वास्तव में किस पैमाने और कितने रोजगार का सृजन हो सका.

याचिका में 9 सीधे सवाल किए गए. पहले 7 सवालों का उद्देश्य ये पता लगाना था कि वित्त की अलग-अलग श्रेणियों में कितने लोगों ने मुद्रा ऋण लिया- 50,000 रुपये या इससे कम, 50,000 से एक लाख के बीच, एक लाख से दो लाख के बीच, दो लाख से पांच लाख के बीच, 5 लाख से 10 लाख के बीच और 10 लाख से ऊपर.

90%  से ज्यादा ऋण ‘शिशु’ श्रेणी

इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम ने ये भी जानना चाहा कि कितने लोगों ने अपना मुद्रा ऋण लौटाया. साथ ही योजना के तहत अब तक कुल कितना ऋण बांटा गया. बता दें कि 50,000 रुपये तक के मुद्रा ऋण को ‘शिशु’ का नाम दिया गया है. इसी तरह 50,000 से 5 लाख के बीच के ऋण को ‘किशोर’   और 5 लाख से 10 लाख के बीच के ऋण को ‘तरुण’ नाम दिया गया. जमानत के तौर पर बिना कुछ रखे दिए जाने वाले इन ऋण का उद्देश्य युवा, शिक्षित और निपुण कारीगरों का विश्वास बढ़ाने के लिए था जिससे कि वे प्रथम पीढ़ी के उद्यमी बनने के सपनों को परवान चढ़ा सकें.

योजना की वेबसाइट पर दिए गए मिशन स्टेटमेंट में कहा गया है, ‘हमारा बुनियादी उद्देश्य समावेशी और सतत तौर पर विकास को गति देना है. इसके लिए भागीदार संस्थाओं को समर्थन और प्रोत्साहन दिया जा रहा है. साथ ही लघु उद्यमी सेक्टर के विकास के लिए इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है.

लेकिन इंडिया टुडे की आरटीआई याचिका पर 8 अगस्त को जवाब मिला वो इस दावे के विपरीत है कि मुद्रा के जरिए रोजगार का बड़े पैमाने पर सृजन हो रहा है.

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जवाब से साफ हुआ कि 13.47 करोड़ ऋणों में से 90%  से ज्यादा ‘शिशु’ श्रेणी में बांटे गए यानी 50,000 रुपये या इससे नीचे की राशि के.  वित्त सेवाएं विभाग से मिले जवाब के मुताबिक मुद्रा के तहत 12.23 करोड़ ऋण प्रति आवेदन 50,000 रुपये से नीचे के थे.

अर्थशास्त्री अजीत रानाडे से जब रोजगार-सृजन कार्यक्रम में 50,000 रुपये तक के ऋण की प्रासंगिकता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘इस तरह के छोटे ऋण सिर्फ एक दुधारू पशु वाले डेरी किसान या किसी ठेलेवाले के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन ये ठोस रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त नहीं है.’

आरटीआई याचिका के जवाब के मुताबिक सिर्फ 1.04 करोड़ मुद्रा ऋण ही 50,000 से 5 लाख रुपये के बीच वाली ‘किशोर’ श्रेणी में आते हैं. वहीं 5 लाख से ऊपर की श्रेणी में सिर्फ 19.60 लाख मुद्रा ऋण ही बांटे गए.

कितनी रकम बंटी, नहीं दिया जवाब

साफ है कि 5 लाख से ऊपर के मुद्रा ऋण का हिस्सा कुल बांटे गए ऋणों का 1.45%  ही बैठता है. वित्त सेवा विभाग इस पर मौन ही रहा कि मुद्रा ऋण के तहत अधिकतम सीमा वाले ऋण कितने लोगों ने लिए.

जवाब में ये भी साफ नहीं किया गया कि मुद्रा ऋण के तहत कुल कितनी रकम बांटी गई. ऋण की लौटाई गई रकम से संबंधित सवाल का भी जवाब नहीं दिया गया है.

वहीं केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने इस बारे में पिछले साल चौंकाने वाला अनुमानित दावा किया था, ‘हमने 8 करोड़ लोगों को 4 लाख करोड़ रुपये के ऋण दिए. अगर इनमें से हर एक ने एक को भी रोजगार दिया तो 4 करोड़ स्वत: ही पैदा हो गए.’

इंडिया टुडे फैक्ट चेक टीम को ऐसा कोई व्यापक अध्ययन नहीं मिला जिससे मुद्रा से अब तक सृजित किए गए रोजगार या नहीं सृजित किए गए रोजगारों को जोड़ा जा सके.

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